धर्मेंद्र प्रधान का इस्‍तीफा… ये मोदी सरकार का सरेंडर है या स्ट्रैटेजी?

 नीट पेपर लीक​ विवाद में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पीएम नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया. (Photo: PTI)‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!’, NEET-UG पेपर लीक विवाद में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के फाउंडर अभिजीत दिपके का यह बयान सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है. छात्र संगठनों और विपक्ष में जश्न का माहौल है कि उन्होंने मोदी सरकार को घुटनों पर ला दिया. लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या वाकई इस विरोध-प्रदर्शन ने पीएम नरेंद्र मोदी के उस मजबूत ‘स्ट्रॉन्ग-मैन’ वाले अक्स को झुका दिया है? या फिर यह इस्तीफ़ा किसी झुकाव का नतीजा नहीं, बल्कि सरकार का एक बहुत बड़ा और सोचा-समझा डेमेज कंट्रोल और पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी है? 3 मई को करीब 22 लाख छात्रों द्वारा दिए गए NEET-UG एग्जाम से लेकर टेलीग्राम पर लीक हुए PDFs, CBI रेड्स, फिर जंतर-मंतर पर भड़के छात्र आंदोलन और अंत में प्रधान के इस्‍तीफे तक पूरा वाकया बताता है कि सरकारें संकट के वक्त कैसे रिएक्ट करती हैं.

इस पूरे घटनाक्रम में मोदी सरकार के क्राइसिस मैनेजमेंट और फैसले लेने के तरीके को 10 बड़े सबकों या takeaways से समझा जा सकता है:

1. शुरुआत में प्रॉब्लम को हल्का समझना

जब 3 मई को परीक्षा खत्म होते ही व्हिसलब्लोअर्स और कोचिंग टीचर्स ने व्हाट्सएप व टेलीग्राम पर लीक हुए पेपर के स्क्रीनशॉट NTA (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) को भेजे, तो शुरुआत में इसे बहुत हल्के में लिया गया. सरकार और अफसरों ने इसे ‘स्थानीय गड़बड़ी’ या फर्जी अफवाह बताकर टालने की कोशिश की. संकट के शुरुआती दिनों में अगर सरकार समस्या की गहराई को समझ लेती, तो यह मामला देशव्यापी जन-आक्रोश का रूप नहीं लेता.

2. सरकारी ढर्रा और रिस्पॉन्स में देरी

लाखों कैंडिडेट्स का भविष्य दांव पर था, लेकिन NTA और मिनिस्ट्री की तरफ से कोई त्वरित एक्शन नहीं दिख रहा था. जब राजस्‍थान और महाराष्‍ट्र से आरोपियों की गिरफ्तारी और CBI जांच की मांग उठने लगी, तब भी सरकारी तंत्र जांच-जांच का खेल खेलता रहा. संसदीय सम‍ित‍ि के सामने भी यही कहा गया क‍ि पेपर लीक नहीं हुआ है. इस सुस्ती और अनदेखी ने छात्रों के मन में एजेंसी के प्रति अविश्वास को और गहरा कर दिया.

3. सिस्टम में सुधार के बजाय डिफेंसिव रवैया

जब सवाल उठे, तो सरकार की पहली प्राथमिकता सिस्टम रिफॉर्म करने के बजाय एजेंसी का बचाव करना थी. प्रेस कॉन्फ्रेंस में बार-बार यही कहा गया कि ‘परीक्षा की निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं हुआ है.’ लेकिन जब कोर्ट और मीडिया में फैक्ट्स आने लगे, तो सरकार का यह डिफेंसिव मोड उसी पर भारी पड़ गया.

4. स्टूडेंट्स के साथ कम्युनिकेशन गैप

22 लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स और उनके पेरेंट्स दिन-रात असमंजस में थे. लेकिन मिनिस्ट्री की तरफ से कोई सीधा और साफ संवाद नहीं हो रहा था. वक्त पर सही जानकारी न मिलने की वजह से सोशल मीडिया पर अफवाहें तेजी से फैलीं. छात्रों को लगा कि सरकार उनकी बात सुनने के बजाय मामले को दबाने में लगी है. सरकार की तरफ से इतना ही कहा गया क‍ि दोबारा NEET होगी, और उसके ल‍िए क‍िसी से फीस नहीं ली जाएगी.

5. पब्लिक प्रेशर के आगे रणनीति बदलना

जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का गुस्सा फूटा और सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर हुईं, तब सरकार को अपनी जिद छोड़नी पड़ी. NTA में बदलाव के बारे में खबर आई. र‍िफॉर्म की बातें कही जाने लगी. यह साफ दिखाता है कि जब जनता का दबाव बढ़ता है, तो कड़े से कड़े रुख में बदलाव करना पड़ता है.

6. सरकार का लचीलापन

मोदी सरकार को आमतौर पर अपने फैसलों पर डटे रहने के लिए जाना जाता है, लेकिन इस केस में सरकार ने फ्लेक्सिबिलिटी दिखाई. भले ही पूर्व ISRO चीफ के. राधाकृष्णन कमेटी की सिफारिशें लागू की गई थीं, फिर भी ‘कमांड चेन’ में चूक स्वीकार की गई. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार करना यह साबित करता है कि सरकार जनता के मूड को देखकर अपनी स्ट्रेटेजी बदलने में झिझकती नहीं है.

7. लॉ एंड ऑर्डर और अराजकता के खतरे को भांपना

जंतर-मंतर पर बढ़ता प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर युवाओं का एकजुट होना सरकार के लिए खतरे की घंटी था. अगर यह गुस्सा और भड़कता तो देश भर में लॉ एंड ऑर्डर (कानून-व्यवस्था) की गंभीर स्थिति बन सकती थी. खुफ‍िया एजेंसी की तरफ से ऐसे इनपुट आ रहे थे क‍ि कई अराजक तत्‍व और उग्र संगठन छात्र आंदोलन की आड़ में द‍िल्‍ली में ह‍िंसा फैला सकते हैं. सरकार ने सही समय पर भांप लिया कि छात्रों के इस आंदोलन को राजनीतिक हवा मिल रही है, इसलिए सबसे बड़े पॉलिटिकल टारगेट शिक्षा मंत्री का इस्तीफा कराकर आंदोलन की हवा ही निकाल दी.

8. गलती स्वीकार करने में झिझक न दिखाना

धर्मेंद्र प्रधान ने खुलकर कहा क‍ि ‘राधाकृष्णन कमेटी की सलाहों के बावजूद कमांड चेन टूटी, हम इसकी जिम्मेदारी लेते हैं.’ सरकार ने अपनी विफलता को माना, 3 मई का एग्जाम कैंसिल किया, CBI जांच कराई और मंत्री का इस्तीफा लेकर यह संदेश दिया कि उनसे गलती हुई है और वे इसे सुधारने के लिए तैयार हैं.

9. लॉन्ग-टर्म गवर्नेंस विजन पर फोकस

तात्कालिक विवाद को शांत करने के साथ-साथ सरकार ने अपने लॉन्ग-टर्म विजन पर काम शुरू किया. 2027 से NEET को पूरी तरह से कम्प्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT Mode) में बदलने की घोषणा की गई, ताकि पेपर लीक की गुंजाइश ही न रहे. यानी तात्कालिक नुकसान सहकर भी भविष्य के लिए गुड गवर्नेंस का ढांचा तैयार करने पर ध्यान दिया गया है.

10. साबित करना कि ‘कोर एजेंडा’ से बड़ा कोई नहीं

इस पूरे एपिसोड का सबसे बड़ा मैसेज यही है कि पीएम नरेंद्र मोदी के गवर्नेंस एजेंडे और सरकार की विश्वसनीयता से बड़ा कोई भी मंत्री या चेहरा नहीं है. जब बात देश के करोड़ों युवाओं के भरोसे और प्रतियोगी परीक्षाओं की साख पर आई, तो सीनियर लीडर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने में भी देरी नहीं की गई.

तो क्या यह सरकार का सरेंडर है? जवाब है- नहीं, यह सरेंडर से ज्यादा एक रणनीतिक फैसला है. अभिजीत दिपके और विपक्षी दल भले ही इसे अपनी जीत बताकर ‘झुकाने’ का दावा करें, लेकिन राजनीति में एक कदम पीछे खींचकर दस कदम आगे की नींव रखी जाती है. मोदी सरकार ने इससे पहले भूम‍ि अध‍िग्रहण सुधार ब‍िल और कृष‍ि कानूनों के मामले में कदम पीछे खींचे हैं. प्रधान का इस्तीफा लेकर मोदी सरकार ने इस विवाद को लंबे समय तक खिंचने से रोक दिया, लॉ एंड ऑर्डर के बड़े खतरे को टाल दिया और यह संदेश भी दे दिया कि युवाओं के भरोसे के सामने कोई भी मंत्री बड़ा नहीं है.

बस, पूरे घटनाक्रम में एक कसर बाकी रह गई है. जो आज हुआ है, वो पहले हो जाना चाह‍िए था. खैर, जैसा क‍ि मुरली मनोहर जोशी ने अपनी X पोस्‍ट में ल‍िखा है- ‘देर आए, दुरुस्‍त आए’.