सूचना विभाग में Blackmailing का बड़ा खेल, खबर लगाकर किया Dealing फिर खबर किया Delete

ब्रिजेन्द्र कुमार वर्मा

ये हैं लखनऊ के  पत्रकार, नाम है ब्रिजेन्द्र कुमार वर्मा ये दो तीन न्यूज़ पोर्टल के मालिक हैं जिसमे www.suspensecrime.com और www.newsindialive.in मुख्य हैं. www.newsindialive.in पर इन पत्रकार महोदय ने एक खबर लगाई और पहुंच गए अपनी सेटिंग कराने. सेटिंग हुई भी और जो ये लाभ विभाग से पाना चाहते थे सायद वो इनको मिल भी गया क्योंकि इसके तुरंत बाद पत्रकार महोदय ने अपने न्यूज़ पोर्टल से विभाग की खबर को हटा दिया . सवाल ये उठता है कि क्या ये खबर सिर्फ विभाग के अधिकारी को ब्लैकमेल करने के लिए लगाई गई थी. इस खबर को लेकर जब विभाग के उस अधिकारी से मेरे द्वारा संपर्क किया गया और खबर पर उनका विचार जानने का प्रयास किया गया तो अधिकारी महोदय ने पूरी तरह से मौन धारण कर लिया.  उनका ये मौन बताता है की उनके खिलाफ लगी खबर पूरी तरह सत्य है फिर पत्रकार महोदय ने खबर को पोर्टल से डिलीट क्यों किया. जो खबर लगाकर फिर पोर्टल से हटा दी गई वो खबर निचे दी जा रहा है आप सब भी उसे पढ़ें और विचार करें ……………………………..

निचे वो खबर है जिसे डीलिंग के बाद किया गया डिलीट

पहली खबर ……………

यूपी सूचना विभाग में विज्ञापन का बड़ा ‘खेल’: पीसीएस अधिकारी अनुराग प्रसाद पर गंभीर आरोप, स्थानीय पब्लिशर्स में भारी आक्रोश

उत्तर प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (Information and Public Relations Department) से एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है। विभाग के वेब मीडिया विंग में तैनात पीसीएस अधिकारी और मीडिया प्रभारी अनुराग प्रसाद की कार्यप्रणाली को लेकर पब्लिशर्स और मीडिया जगत में गहरा असंतोष है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, विभाग के भीतर इन दिनों पारदर्शिता को ताक पर रखकर कथित तौर पर मनमर्जी और भ्रष्टाचार का खेल चलाया जा रहा है।

स्थानीय मीडिया संगठनों और पब्लिशर्स का आरोप है कि जो अधिकारी उत्तर प्रदेश के मीडिया को मजबूत करने के लिए जिम्मेदार हैं, वही अब यूपी के पब्लिशर्स के हितों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

यूपी के पब्लिशर्स की अनदेखी, दिल्ली और अन्य राज्यों पर मेहरबानी

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा कारण विज्ञापन (Government Advertisements) के आवंटन में किया जा रहा कथित पक्षपात है। उत्तर प्रदेश के छोटे और मध्यम पब्लिशर्स, जो दिन-रात जमीन पर रहकर सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाते हैं, उन्हें विज्ञापन के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिल रहा है।

विज्ञापनों के इस कथित असमान वितरण को आप नीचे दी गई तालिका से समझ सकते हैं:

पब्लिशर्स का सीधा आरोप है कि पीसीएस अधिकारी अनुराग प्रसाद जानबूझकर यूपी के पब्लिशर्स को दरकिनार कर बाहरी राज्यों की कंपनियों और पब्लिशर्स को फायदा पहुंचा रहे हैं।

बंद कमरे में घंटों बैठक, आम पब्लिशर्स के लिए समय नहीं

सूत्रों के हवाले से जो जानकारियां सामने आ रही हैं, वे विभाग के प्रशासनिक माहौल पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं। आरोप है कि दफ्तर में आने वाले आम और जरूरतमंद पब्लिशर्स से बात करने के लिए मीडिया प्रभारी के पास दो मिनट का समय भी नहीं होता है। वे अपनी समस्याओं को लेकर हफ्तों चक्कर काटते रहते हैं।

इसके विपरीत, सूत्रों का दावा है कि महिलाओं से बंद कमरे में घंटो मीटिंग होती है सूचना भाग के कमरे में यही कारनामा PR ऑफिस में भी इनके द्वारा किया जाता है आम मीडियाकर्मियों के प्रति इस तरह का उदासीन और चयनात्मक (Selective) रवैया अधिकारियों की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करता है।

खुलेआम घूसखोरी और लेनदेन की चर्चा

विभागीय सूत्रों के अनुसार, विज्ञापन देने के इस पूरे तंत्र के पीछे कथित तौर पर भारी लेनदेन और घूसखोरी का खेल चल रहा है। आरोप है कि जो लोग तय ‘कमीशन’ या रिश्वत देने को तैयार हैं, उनके विज्ञापनों को तुरंत मंजूरी मिल जाती है, जबकि ईमानदारी से काम करने वाले पब्लिशर्स की फाइलें महीनों तक दबाकर रखी जाती हैं।

इस तरह के भ्रष्टाचार से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance against Corruption) के दावों को भी ठेस पहुंच रही है। पब्लिशर्स के संगठनों ने अब इस मामले को लेकर उच्च स्तर पर शिकायत दर्ज कराने और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच (Vigilance Inquiry) कराने की मांग शुरू कर दी है, ताकि स्थानीय मीडियाकर्मियों को उनका हक मिल सके।


दूसरी खबर ……………

‘आम पब्लिशर्स के लिए वक्त नहीं, पर बंद कमरों में घंटों मीटिंग…’


सूचना विभाग के सहायक निदेशक अनुराग प्रसाद के रवैये पर भड़के लोग

उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में अंदर खाने कुछ ऐसा चल रहा है..जिसे नहीं चलना चाहिए था…!! बाहर से आए “दो खिलाड़ी” अधिकारी खुलकर बैटिंग कर रहे हैं….!! कोई डर नहीं कोई जवाबदेही नहीं….!! खुद का राग फिट है …अगर उस राग पर आपका राग सेट हो गया तो आप सूचना विभाग की पिच पर कहीं से भी बिना बल्ले के शाट्स खेलिए..!!!
विभाग के विज्ञापन आवंटन में मनमानी या कुछ और? सूचना विभाग के सहायक निदेशक अनुराग प्रसाद के रवैये से पब्लिशर्स में भारी आक्रोश है।
किसी भी सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुँचाने में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस विभाग का काम पारदर्शी तरीके से सभी पब्लिशर्स और मीडिया माध्यमों को साथ लेकर चलना है। लेकिन हाल के दिनों में विभाग के भीतर से आ रही खबरें एक अलग ही कहानी बयां कर रही हैं। विभाग के सहायक निदेशक (Assistant Director) अनुराग प्रसाद के कामकाज के तरीके और उनके रवैये को लेकर स्थानीय और आम पब्लिशर्स के बीच गहरा असंतोष पनप रहा है।

पब्लिशर्स का आरोप है कि विभाग के भीतर पक्षपात और मनमानी का एक नया ढर्रा चल पड़ा है, जिससे छोटे और स्वतंत्र मीडिया हाउसों का अस्तित्व खतरे में आ गया है।

बंद कमरों में मीटिंग और आम पब्लिशर्स की अनदेखी का आरोप

विभिन्न मीडिया पब्लिशर्स द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों में सबसे गंभीर आरोप सहायक निदेशक के पक्षपातपूर्ण व्यवहार को लेकर है। पब्लिशर्स का कहना है कि जहां एक तरफ आम पब्लिशर्स अपनी जायज मांगों और विज्ञापनों के सिलसिले में मिलने पहुंचते हैं, तो उन्हें मिलने के लिए कुछ मिनट का समय भी बड़ी मुश्किल से मिलता है। अक्सर उन्हें टाल दिया जाता है या उनके प्रपोजल पर विचार तक नहीं किया जाता।

इसके विपरीत, आरोप है कि कुछ खास प्रपोजल और महिला प्रतिनिधियों के आने पर नियमों को ताक पर रख दिया जाता है। बंद कमरों में घंटों तक मीटिंग का दौर चलता है और उन प्रपोजल्स पर बिना किसी देरी के तत्काल विज्ञापन जारी कर दिए जाते हैं। पब्लिशर्स का कहना है कि इस तरह का दोहरा मापदंड और भेदभावपूर्ण रवैया किसी भी सरकारी अधिकारी की गरिमा और विभाग की पारदर्शिता के खिलाफ है।

डीएवीपी (DAVP) नियमों का बहाना या निजी नुकसान को छुपाने की कोशिश?

जब छोटे पब्लिशर्स अपने रोके गए भुगतानों या नए विज्ञापनों की मांग को लेकर सहायक निदेशक अनुराग प्रसाद के पास जाते हैं, तो उन्हें अक्सर एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है। अधिकारियों का तर्क होता है कि “डीएवीपी (DAVP) के आधार पर नॉन-डीएवीपी (Non-DAVP) का भुगतान करने के लिए शासन स्तर पर फाइल अभी विचाराधीन है।” इस तकनीकी बहाने को आगे कर महीनों से पब्लिशर्स की फाइलें दबाकर रखी गई हैं।

लेकिन इस कथित ‘विचाराधीन फाइल’ के पीछे का सच कुछ और ही इशारा करता है:

करोड़ों का खेल: एक तरफ जहां छोटे पब्लिशर्स को बजट और फाइलों का हवाला देकर खाली हाथ लौटाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ विभाग द्वारा चुनिंदा लोगों के लिए करोड़ों रुपये के विज्ञापन लगातार जारी किए जा रहे हैं।

तुरंत भुगतान: केवल विज्ञापन जारी ही नहीं हो रहे, बल्कि बैक-चैनल से उनका मोटा भुगतान भी समय पर क्लियर किया जा रहा है।

पब्लिशर्स का सीधा सवाल: क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है?

छोटे और मध्यम पब्लिशर्स का कहना है कि जब नियम सबके लिए एक समान होते हैं, तो फिर बजट और फाइलों का संकट सिर्फ आम लोगों के लिए ही क्यों पैदा होता है? एक ही विभाग के भीतर दो अलग-अलग व्यवस्थाएं चलना साफ तौर पर यह दर्शाता है कि पारदर्शिता की आड़ में मनमानी का खेल चल रहा है। अगर शासन स्तर पर फाइलें रुकी हैं, तो फिर करोड़ों के अन्य विज्ञापनों का भुगतान किस आधार पर किया जा रहा है?

इस पूरे घटनाक्रम ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। पब्लिशर्स ने अब इस मामले को उच्च अधिकारियों और शासन के आला दरबार तक ले जाने की तैयारी कर ली है, ताकि इस कथित भेदभाव और विज्ञापन आवंटन के खेल की निष्पक्ष जांच हो सके और सभी को उनका वाजिब हक मिल सके।